वाराणसी। ‘आज’ अखबार से आर. राजीवन निकाल दिए गए। वरिष्ठ पत्रकार। सुनिए इनकी दास्तान। ये कहते हैं- फर्जी मुकदमा या हत्या शायद यही मेरे पत्रकारिता कर्म की संचित पूंजी हो, जो शायद आने वाले दिनों में मुझे उपहार स्वरूप मिले तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. यकीन मानिए पूरे होशो-हवास में सच कह रहा हूं। हिन्दी का सबसे पुराना अखबार जो 5 साल बाद अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है, उसी ‘आज’ अखबार में मैने 25 साल तक सेवा की, लिखता-पढ़ता रहा। निष्ठा-ईमानदारी के साथ अपने काम को अंजाम देता रहा। लेकिन एक दिन अचानक मुझे बिना किसी कारण-बिना किसी नोटिस के बाहर का रास्ता दिखा दिया।

बकाया वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, ग्रेच्युटी तो दूर, देने के नाम पर मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त ने कुछ दिया तो देख लेने की धमकी। ये जो ‘आज’ अखबार के मालिक और सम्पादक शार्दूल जी हैं, इनका कहना है तुम चीज क्या हो? मैं ही सब हूं। मैं चाहूं तो किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। हां एक दिन कुछ इसी तरह से उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुला कर समझाया और ठीक इसके दूसरे दिन मैं सड़क पर था, अपने पत्रकारीता जीवन के यादों के साथ।

सोच रहा था विद्या भास्कर, लक्ष्मी शंकर व्यास, चन्द्र कुमार जैसे सम्पादक जिनके सान्ध्यि में मैने पत्रकारिता का कहकरा सीखा, उसी संस्थान के वर्तमान बढ़बोले और हठी संपादक की नजर में एक रिक्शेवाला भी संपादक हो सकता है, यानि योग्यता और नजरिया कोई मायने नहीं रखता। …झूठा अहम भी क्या कुछ नहीं कहता और करता, शार्दूल विक्रम गुप्त इसके उदाहरण हैं। कुछ दिन लगे इस सदमें से उबरने में। जब उबरा तो स्मृति में हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के साथ गुजरे 25 सालों की न जाने कितनी यादें दस्तक देने लगी। और यादों के झरोखे से साथ में काम करने वालों के बुझे और उदास चेहरे याद आने लगे। जो काम तो पूरे ईमानदारी से करते रहे, पर इसके ऐवज में जो मिला, शौक तो छोड़िए उससे जरूरतें कभी पूरी न हो सकी।

इनमें से एक चेहरा था राजेन्द्रनाथ का। उन्होंने भी इस संस्थान में अपने जीवन का लम्बा समय दिया। पर जब राजेन्द्र लकवा के शिकार हुए तो संस्थान ने उनसे मुंह फेर लिया। मदद के नाम पर हम कुछ पत्रकार साथियों ने व्यक्तिगत तौर पर मदद किया। हां, काम के ऐवज में राजेन्द्र को संस्थान सें उनका हक तो मिला पर कई टुकड़ों में। राजेन्द्र जी ही क्यों, कई चेहरे है, जो हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के शोषण के शिकार हुए हैं, और कई हो रहे हैं। एलबीके दास, गोपेश पाण्डेय, प्रमिला तिवारी… और भी लम्बी फेहरिस्त है… इन्हें अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अखबारी दुनिया का ये सबसे दुखद पहलू है, कि खबर लिखने, उसे सजाने-सवांरने वालो की जिदंगी की खबर बेखबर बन कर रह जाती है। मीडिया इंडस्ट्री में इस तरह की हजारों सिसकियां मौजूद हैं, जो मालिक-प्रबंधन के निर्ममता की उपज है। कुछ मिल जायेगा, शायद यही वजह है, कि होंठ सबके सिले हैं, वरना अन्दर ही अन्दर आक्रोश का एक तूफान तो सबको मथ रहा है।

अपने प्रंसग पर लौटता हूं, इन दिनों अपने हक को पाने की लड़ाई लड़ रहा हूं। अपने मेहनताने को पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की पहल कर  चुका हूं। भविष्य निधि कार्यालय से एक नोटिस भी अखबार को जारी हो चुका है, साथ ही साथ बहुत-कुछ समझ-बूझ कर इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि लड़ने के सिवाय कोई और चारा नहीं है। सो तय किया हूं कि मैं लड़ूगा अपने हक के लिए, कहूंगा अपनी बात, मैं किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। संपादक होने के भ्रम में जो खुद के खुदा होने का गुमान पाले बैठे हैं, उनके भ्रम को तोड़ना जरूरी है। इतना तो जानता हूं कि कुछ न कुछ तो होकर रहेगा… मालिक, प्रबंधन की तरफ से फर्जी मुकदमा, जानलेवा हमला या फिर कुछ….. और, चाहे जो कुछ भी हो, खामोश रहने से बेहतर है, अपनी बात कहते हुए दुनियां से जाना… कम से कम वो चेहरे तो बेनकाब होंगे जो आदर्श का खाल ओढ़कर और शब्दों का जाल बुनकर अपनी काली करतूतों को छुपाए फिर रहे है। वो सब कहूंगा तफसील और सिलसिले से…. जो छुपाया जा रहा है, सामने लाकर रहूंगा। फिलहाल इतना ही कहूंगा……भडास वरून साभार

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