पत्रकारों के लिए अब निर्णायक समय आ गया है क्योंकि हर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार श्रम अधिकारियों की विशेष टीमें गठित कर दी हैं और ये टीम 31 जुलाई तक सक्रिय रहेंगी.
हक के लिए हर पत्रकारों को अब सक्रिय होना होगा, नहीं तो ऐसे मौके बार-बार नहीं आते. मामला शांत होते ही मीडिया मालिक अत्याचार का नंगा नाच नाचेंगे, तब मीडिया में काम करना और दूभर हो जाएगा. इसलिए संपादक हो या चपरासी, सब के सब एकजुट होकर श्रम अधिकारी के सामने अपनी बात सबूत समेत रखें.

खास बात यह है कि ब्यूरो आफिस के कर्मचारियों को और सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि श्रम विभाग वहीं जांच करेगा, जहां प्रींटिंग मशीन होगी और ब्यूरो आफिस को छोड़ देगा. इनकी जानकारी न तो हेड आफिस देगा, न ब्यूरो आफिस. इसलिए यहां के कर्मचारी स्वयं श्रम विभाग जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराए. अब सवाल यह उठता है कि हम श्रम विभाग गए और वहां पता चला कि मजीठिया वेतनमान के लिए कोई टीम नहीं बनी है तो. तो सहायक आयुक्त या अन्य अधिकारी के सामने लिखित शिकायत दें और पावती लें. बीच बीच में पता जरूर करें, नहीं मामला रफा दफा हो जाएगा.

संपादक का क्या होगा : चापलूसों के लिए बुरा समय आने वाला है. सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई में मुद्रक प्रकाशकों की गिरफ्तारी हो सकती है. वही मजीठिया आंदोलन को कुचलने में नाकाम रहने के आरोप में मालिक इन पर गुस्सा उतार सकते हैं. व्यापारी सिर्फ पैसे का भूखा होता है. इसलिए हर समाचार पत्र के कर्मचारी अपनी यूनियन बनाएं. बाहरी यूनियन पर निर्भर न रहें. तभी शोषण से मुक्ति मिलेगी. नहीं तो फिर ठेका श्रमिकों की नियुक्ति और शोषण होना तय है.

लेखक एवं पत्रकार महेश्वरी प्रसाद मिश्र से संपर्क : maheshwari_mishra@yahoo.com

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