यूपी के जंगलराज में तब तक कुछ नहीं होता जब तक कि कपार पर कस के डंडा न मारा जाए… जागरण के मालिकों को तलब कर लिया है श्रमायुक्त ने, सुप्रीम कोर्ट के डर से.. ( पढ़ें ये लिंक : http://goo.gl/cEjFk8 ) लेकिन मुझे नहीं लगता इन चोट्टों का कुछ होने वाला है… अफसर माल लेकर मस्त और मालिक शोषण करके मालामाल… सत्ताधारी महाचोरकट नेता इन सभी से थोक में माल लेकर और निहित स्वार्थी मित्रता की डील करके गदगद. न्यायपालिका कितना और कब तक इनको ठोंकती जगाती सिखाती समझाती रहेगी…मजीठिया वेज बोर्ड का मामला एक ऐसा मामला है जिसे आप गौर से देख पढ़ जान लें तो आपका लोकतंत्र पर से पूरा भरोसा उठ जाएगा.

कांग्रेस, भाजपा, सपा… सब इस केस में नंगे हैं. किसी की औकात नहीं बेइमान मीडिया मालिकों को नियम कानून का पाठ पढ़ाने की. सब अपनी अपनी पूंछ दबाए बचाए मालिकों को अभयदान दिए घूम रहे हैं. मीडिया मालिक खुद को लोकतंत्र का राजा माने बैठे इतरा रहे हैं जिनके अधीन सब कुछ है- नेता, अफसर, कानून, पत्रकार, जज… सब… ये नए किस्म का फासीवाद है. मीडिया के माफिया में तब्दील होकर दीमक की तरह लोकतंत्र, आजादी, समानता, मानवता, न्याय को चट कर जाने का फासीवाद.

इस बाजारवादी दौर में न्याय, संघर्ष, सच्चाई, ईमानदारी आदि शब्द बेहद अल्पसंख्यक हो गए हैं.. इनके साथ वो खड़े हैं जो पीड़ित हैं या जो मजबूर हैं. बाई डिफाल्ट हर कोई बाजारवादी हो जाना चाहता है, यानि किसी तरह से ढेर सारा धन हासिल कर लेना चाहता है ताकि हर उपलब्ध सुख को खरीद कर घर में समेट सके. यह सच भी है कि ढेर सारे सुख पैसे से मिलते हैं. हेल्थ से लेकर पर्यटन तक और खाने से लेकर मकान तक, सोचने से लेकर सुरक्षित सुखकर नींद लेने तक के लिए पर्याप्त पैसा जेब में होना चाहिए… आप इस दौर तक हासिल हर वैज्ञानिक तकनीकी हेल्थ टूरिज्म रिलेटेड उपलब्धियों से उपजी चीजों को जीना, जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो आपके पास ठीकठाक पैसे होने चाहिए. तब सच में आप आधुनिक जीवन के हिसाब से जीवन जी सकेंगे और ठीकठाक तरीके से सोच सकेंगे. हम हाशिए के लिए अभी अभाव के चलते स्वत:स्फूर्त उत्तेजना को समेटे आदिम किस्म का जीवन जी रहे हैं और उसी हिसाब से सोच रहे हैं.

बाजारवाद ने ईमानदारी से पैसा पाने कमाने के रास्ते बेहद सीमित कर दिए हैं. या तो कट्टा उठा लीजिए या फिर बेइमान बन जाइए. बहुत तेज दिमाग वाले और करोड़ों में पगार लेने वाले सीईओ-एडिटर-हेड टाइप नौकर लोग संख्या में कितने फीसदी होंगे, बहुत कम. फिर भी उनके दिल से पूछिए कि वो खुद के लिए कितना वक्त निकाल पाते हैं. उनका जीवन एक रोबोट की तरह किसी दूसरे के मकसद के लिए होम खर्च होते बीतता रहता है और वे खुश इस बात में होते रहते हैं कि वो ठीकठाक पैसा कमा रहे हैं. आजकल हो ऐसा गया है कि जिन्हें जीवन जीना नहीं आता, वे पैसे वाले होते जा रहे और जो सचमुच प्रकृति के करीब हैं, जीवन जीना आता है, वे तंगहाल परेशान हैं. क्या यही कंट्रास्ट, यही अंतरविरोध ही जीवन है या प्रकृति है, या गति है?

फिलहाल यह प्रवचन लंबा हो रहा है. आजकल खुद बोलने लिखने से बचता हूं या फिर होइहें वही राम रचि राखा टाइप फील कर सब कुछ को प्रकृति का हिस्सा मान इगनोर मार देता हूं. लेकिन जब सीधे सपाट तरीके से सोचने लगता हूं तो कपार में खून चढ़ने लगता है और धड़कन तेज होने लगती है…

 मुझे देश भर के उन हजारों मीडियाकर्मियों से प्यार है जिन्होंने अपनी अपनी नौकरियों को दांव पर लगाकर अपने हक के लिए अपने मीडिया मालिकों से मोर्चा पंगा लिया और सुप्रीम कोर्ट में मालिकों के खिलाफ केस लगाकर लड़ रहे हैं. बहुत लंबी खिंच गई लड़ाई. मालिकों, सरकारों और सिस्टम ने पीड़ित पत्रकारों को बहुत छला, बहुत खींचा केस, बहुत समय लगाया, इतना कि न्याय मांगने वाले टूट जाएं. हो भी यही रहा है. जाने किस आशा दिलासा पर सब उम्मीद से भरे हैं, लड़े जा रहे हैं. ये हार जाएंगे तो मुझे बहुत अफसोस होगा.

एक बड़ी हार पिछले दिनों हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट में ही हो चुकी है, हिंदुस्तान टाइम्स केे उन सैकड़ों कर्मियों की जिन्होंने छंटनी के खिलाफ एचटी प्रबंधन से सौ करोड़ मुआवजे व नौकरी पर रखे जाने की जीत हाईकोर्ट से हासिल कर ली. उनके जीतने की खबर हमने भड़ास पर बल्ले बल्ले स्टाइल में चलाई थी (पढ़ें जीतने वाली खबर : http://goo.gl/rDte7V ) . अब वो हार गए. प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया. जाने क्या खेल तमाशा हुआ. एचटी के मालिक जीत गए. सौ करोड़ हड़प गए. सैकड़ों की नौकरियां खा तो चुके ही थे, जीने की उम्मीद भी छीन ले गए. इसलिए यह मत मानकर चलिए कि सुप्रीम कोर्ट कोई हनुमान जी की गदा टाइप चीज है.

जब सब कुछ मेनुपुलेट हो / किया जा रहा है, जब सब कुछ बाजार / मालिकों / पैसेवालों के अनुकूल बनाया जा रहा हो ताकि अर्थव्यवस्था की व्यवस्था उछाल मारती रहे तो सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज लोग कोई एलियन नहीं जो दिल्ली के प्रदूषण से निकले खतरनाक आक्सीजन को अपने अंदर धकेलने से इनकार कर अपने किसी दूसरे ग्रह वाले देस से ओरीजनल बूटी बिटामिन हवा मंगा कर खींच रहे हैं. वे भी सत्ता और सिस्टम के नीति नियमों दशा दिशा के संकेतों को अच्छे से पढ़ते समझते हैं और अपने हाथों इस मालिक फ्रेंडली व मजदूर विरोधी अर्थव्यवस्था की स्पीड धड़ाम करने के आरोप मढ़े जाने से बचना चाहते हैं. जैसे हर जगह एक मेनस्ट्रीम होता है वैसे ही जजों में भी एक मेनस्ट्रीम है जो सत्ता सिस्टम के अनुकूल होती है. कम ही जज ऐसे हैं जो वाकई ईमानदार हैं, क्योंकि ईमानदारी भी अब दो किस्म की है. एक है मेनस्ट्रीम वाली ईमानदारी. एक है जनता के प्रति पक्षधरता वाली ईमानदारी. जैसे मेनस्ट्रीम मीडिया में जनपक्षधर लोगों के लिए स्पेस नहीं है, या है तो उन्हें पगलेट या एलियन माना जाता है, उसी तरह जुडीसिरी में भी अब जनपक्षधर ईमानदारों के लिए जगह बहुत कम है. ऐसे जजों को पगलेट, खतरनाक मानते हैं बाकी साथी जज.

जाने क्यों हम हाशिए के लोग उम्मीद से भरे होते हैं, कोई न कोई तर्क जीने हंसने खुश होने के लिए खोज लेते हैं और नीके दिन आने पर बनत न लागे देर टाइप श्लोगन कविता बांचते हुए अच्छे दिनों की उम्मीद में एक के बाद एक बुरे वक्त को अपने आसपास आमंत्रित करते रहते हैं. शायद ज़िंदगी यही है. शायद ज़िंदगी यह नहीं है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क

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