देश भर से इस बात को लेकर पूछताछ की जा रही है कि 16 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले में हुई सुनवाई के दौरान क्या हुआ। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में कई अखबार कर्मी मौजूद थे। उन्होंने बाकी साथियों को इस संबंध में सूचनाओं का आदान-प्रदान भी किया है, फिर भी जिज्ञासा बनी हुई है। हालांकि इस दिन अखबार कर्मियों के पक्ष में कोई भी सुनवाई नहीं हुई। इस दौरान विशेषतौर पर इनाडू अखबार के प्रकाशक उषोदया पब्लिकेशन्स की ओर से उस समय आशा की किरण दिखाई दी, जब सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रामण्यम ने यह कहते हुए कोर्ट से समय की मांग की कि वह मजीठिया वेजबोर्ड कार्यान्वयन से जुड़े विवरण पर अपने मुवक्किल एवं अखबार के मालिक रामोजी राव से चर्चा करना चाहते हैं।

यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि इनाडू देश का पहला अखबार है, जिसने अविभाजित आंध्रप्रदेश के प्रत्येक जिला मुख्यालय से समाचार प्रकाशित करना शुरू किया था। इसके चलते अब तेलंगाना राज्य के भी हर जिला मुख्यालय से यह अखबार प्रकाशित हो रहा है। यह एक व्यापक प्रसारित अखबार है और इसका मालिक रामोजी राव, दोनों ही राज्यों की राजनीति और नौकरशाही ढांचे में व्यापक रसूख रखता है। यह माना जाता है कि रामोजी राव जो कभी सीपीआई कार्डधारक था, अब मीडिया मुगल बनने के बाद किसी के भी कैरियर और भविष्य की संभावनाओं को बना और बिगाड़ सकता है। यही कारण है कि दोनों राज्यों का कोई भी राजनेता उसके रंगरूप की परवाह किए बिना उसकी इच्छा और चाहत के खिलाफ नहीं जा सकता।

मजीठिया वेजबोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद इस अखबार के सैकड़ों कर्मचारियों को इस्तीफा देने को मजबूर किया गया, मगर प्रहसन यह है कि इन्हें या तो बाऊचर पेमेंट पर या फिर एडहॉक आधार पर नौकरी पर रख लिया गया। दोनों राज्यों के श्रम विभागों को इतना साहस नहीं है कि वे इस मीडिया मुगल को कानून का पालन करने के लिए कह सकें। ऐसे में वे व्यावहारिक रूप से रामोजी राव के नौकर बनकर रह गए हैं। सीनियर काऊंसिल गोपाल सुब्रमण्यम के लिए यह चुनौती होगी, जिन्होंने जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की बैंच को यह आश्वासन दिया है कि वह अपने प्रबंधन पर इस न्यायालय के आदेशों को अक्षरश: लागू करवाने के लिए दबाव बनाएंगे। उन्हें यह कहते सुनना खुशी की बात थी कि क्रियान्वयन का मतलब चेहरे को ढकने वाला क्रियान्वयन नहीं होता बल्कि संपूर्ण क्रियान्वयन होता है। वहीं उषोदया पब्लिकेशन्स के कर्मचारियों ने अपने रिज्वाइंडर में कहा है कि समाचारपत्र ने उचित तरीके से नहीं बल्कि मजीठिया वेज बोर्ड के क्रियान्वयन का ढोंग किया है।
बुधवार की तारीख को पूर्व के आदेशानुसार लीगल इश्यू तय किए जा रहे थे, मगर बहस शुरू होने से पूर्व ही दैनिक जागरण की ओर से उपस्थित हुए सीनियर एडवोकेट अनिल दीवान ने इश्यू तय करने को लेकर प्रारंभिक आपत्तियां दर्ज करवा दीं। हालांकि जस्टिस गोगोई ने उसकी आपत्तियों को निरस्त कर दिया, मगर इस बीच गोपाल सुब्रमण्यम उठ खड़े हुए और अपने मुवक्किल की ओर से फैक्ट वेरिफाई करने का सयम मांग लिया, ताकि वे तथ्यात्मक स्थिति के संबंध में कोर्ट को रिपोर्ट कर सके। कोर्ट ने सकारात्मक दावे के साथ किए गए उनके निवेदन को आसानी से स्वीकार कर लिया।

यहां यह बात काफी दिलचस्प है कि इस मामले के सबसे बड़े अवमानना करने वाले समाचारपत्र जागरण प्रकाशन लिमिटेड की प्रबंधन इस मामले की लगभग प्रत्येक सुनवाई के दौरान अपने वकीलों को बदलती आ रही है। यह सिलसिला सीनियर एडवोकेट पीपी राव से शुरू हुआ था, फिर अगली सुनवाई में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल आए और जब कपिल सिब्बल ने अखबार की पेरवी से इनकार कर दिया तो दूसरे सीनियर एडवोकेट आर्यमन सुंदरम को लाया गया। जब उन्होंने देखा कि अखबार को बचाने का कोई रास्ता नहीं है, तो उन्होंने खुद को मामले से हटा लिया। हैरानी की बात है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने इस बार की सुनवाई पर 16 नवंबर को एक ओर सीनियर वकील अनिल दीवान को पेश कर दिया। यह कहा जा रहा है कि जब दीवान को भी जागरण प्रबंधन के स्पष्ट घटियापन का पता चलेगा तो संभवत: वे भी इस कुख्यात प्रबंधन का बचाव करने को सहमत नहीं हो पाएंगे।

-परमानंद पांडे
सक्रेटरी जनरल-आईएफडब्ल्यूजे

अनुवाद: रविंद्र अग्रवाल

LEAVE A REPLY