Thursday, April 22, 2021

काय आहे मजिठियाचं म्ङणणं?

श्रमिक पत्रकारांना मजिठिया वेतन आयोगाने केेलेल्या शिफारशींनुसार वेतन मिळावे,सुप्रिम कोर्टाने दिलेल्या आदेशाचे राज्य सरकारने पालन करावे या मागणीसाठी राज्यातील बीयूजेसह विविध पत्रकार संघटना संघर्ष करीत आहेत.16 नोव्हेंबर रोजी मराठी पत्रकार परिषद,पत्रकार हल्ला विरोधी कृती समिती आणि अन्य संघटनांनी राज्यभर धरणे आंदोलन करण्याचे ठरविले आहे.पेन्शन,छोटया वृत्तपत्रांचे प्रश्‍न,पत्रकार संरक्षण कायद्याची अंमलबजावणी आणि मजिठिया या मागण्यांसाठी हे आंदोलन आहे.पेन्शन आणि छोटया वृत्तपत्रांचे काय प्रश्‍न आहेत हे दोन स्वतंत्र लेखाव्दारे विस्ताराने मांडलेले आहे.आज मजिठियाची लढाई समर्थपणे लढणारे मुंबईतील पत्रकार इंदरकुमार जैन यांनी मजिठियाच्या लढाईची माहिती देणारा लेख लिहिला आहे.तो आम्ही येथे देत आहोत.त्यासाठी खालील लिंकवर क्लीक करा.

मजीठिया अभियान को महाराष्ट्र में मिल रही कामयाबी

महाराष्ट्र के अखबार मालिक परेशान हैं. सकाल, लोकमत, नवभारत, दिव्य मराठी, इंडियन एक्सप्रेस, पुन्य नगरी, मिड डे और दैनिक bhaskaभास्कर समेत कई अखबारों के कर्मचारियों ने मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार बकाया राशि के लिए क्लेम यानी दावे दाखिल कर दिए हैं. इनमे से कुछ मामले लेबर कोर्ट भी पहुँच चुके हैं. जल्दी ही कई अन्य अखबारों के कर्मचारी अपने दावे करने की तैयारी कर रहे हैं. इसी बीच सुप्रीमकोर्ट से खुश खबर आ गई है जिसमे कहा गया है कि अब श्रम विभाग की ओर से क्लेम के रिफरेन्स भिजवाए जाने के बाद लेबर कोर्ट और इंडस्ट्रियल कोर्ट को संभवतः ६ महीने के भीतर फैसला सुनना होगा. अखबार मालिकों के शोषण और अत्याचार से पीड़ित कर्मचारियों के लिए ये काफी राहत देने वाली खबर है. दरअसल बछावत और मनीसाना वेतन आयोग से जुड़े कई मामले बरसों से अदालतों में चल रहे है इसलिए अदालतों की देरी से परेशान कर्मचारी इस बार जल्दी न्याय मिलने की उम्मीद कर सकते हैं.

वैसे १९ जून २०१७ को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही अखबार मालिक बेचैन हैं. मजीठिया वेतन आयोग पर अमल न होने सम्बन्धी अवमान याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने साफ़ कर दिया कि अखबारों मे काम कर रहे सभी कर्मचारियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशों के मुताबिक भुगतान करना अनिवार्य है, भले ही कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहा हो. यानी सीटीसी या कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों को भी इसका लाभ देना जरूरी है. इसके अलावा उन अखबारों को झटका दिया जिन्होंने अपने कर्मचारियों से लिखवाकर लिया था कि वे मौजूदा वेतन से संतुष्ट हैं. सकाळ जैसे कुछ अखबार मालिक अभी भी कर्मचारियों पर दबाव डालकर जबरन दस्तखत ले रहे हैं लेकिन उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

मजीठिया अभियान

महाराष्ट्र में इस अभियान की शुरुआत २०१६ में हुई जब बृहन्मुंबई यूनियन ऑफ़  जरनलिस्ट्स यानी बीयूजे की पहल पर राज्यस्तरीय एक्शन कमिटी का गठन किया गया. इसमें पुणे श्रमिक पत्रकार संघ, नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ के साथ साथ मराठी पत्रकार परिषद्, प्रेस क्लब, और मंत्रालय पत्रकार संघ भी शामिल हुआ. कमिटी की ऑर से विपक्ष के नेताओं को मजीठिया आयोग से जुडी जानकारी दी गई जिसके आधार पर राज्य विधानसभा और परिषद् में पत्रकारों की दुर्गति और उनके शोषण पर लम्बी चर्चा हुई. सदन में इसका जवाब देते हुए तत्कालीन श्रम मंत्री प्रकाश मेहता ने माना था कि पत्रकारों का बुरी तरह शोषण किया जाता है इसलिए श्रम विभाग ठोस कारवाई करेगा. करीब दो महीने बाद मंत्रालय में उच्च स्तरीय बैठक हुई पत्रकार संघों के साथ साथ अखबार मालिकों को भी बुलाया गया. श्रम विभाग के अधिकारियों को पत्रकारों के वेतन से जुड़े मामले गंभीरता से लेने को कहा गया. इसके बाद श्रम आयुक्त की अध्यक्षता में त्रिपक्षीय समिति बने गई जिसमे बीयूजे के मंत्रराज पांडे, एक्शन कमिटी की ओर से मुझे  और एनयूजे की शीतल करदेकर को शामिल किया गया . पुणे के शशिकांत भागवत और नागपुर के शिरीष बोरकर ने मजीठिया अभियान को पूरा समर्थन दिया.

अक्सर पत्रकार शिकायत करते हैं कि श्रम विभाग हमारे मामले निपटाने में दिलचस्पी नही लेता. पर एक्शन कमिटी का अनुभव है कि तमाम तरह के दबावों के बावजूद श्रम विभाग के अधिकारी हमारे अभियान को मदद कर रहे हैं. श्रम विभाग को दोष देना सबसे आसान काम है पर क्या हम कभी सोचते हैं कि हम पत्रकार अपने अधिकारों के लिए कितने जागरूक हैं? ज्यादातर पत्रकार तो वेतन आयोग की बात सुनकर ही डर जाते हैं. न तो शिकायत करने के लिए आगे आते हैं और न ही अपने पर हो रहे अन्याय की जानकारी देते हैं. पुणे में जब पत्रकार संघ कि तरफ से मजीठिया वेतन आयोग के बारे में बैठक आयोजित की गई तब मुंबई से पांडेजी और मै खुद वहां पहुच गए लेकिन पुणे के पत्रकार गैरहाजिर थे. पुणे पत्रकार संघ के पदाधिकारी कह रहे थे कि सभी पत्रकार बातें तो करते हैं लेकिन सामने आना नहीं चाहते.

पूरे राज्य के पत्रकारों में जबरदस्त भय का वातावरण है . फिर भी सैकड़ों कर्मचारी अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. मुंबई में सकाल के ६० से ज्यादा कर्मचारियों के मजीठिया एरिअर्स का मामला ठाणे की लेबर कोर्ट में है. नवभारत के ५० कर्मचारियों का करीब ६ करोड़ का दावा श्रम विभाग के सामने है. जागरण अखबार समूह के अंग्रेजी दैनिक मिड डे के ५० कर्मचारियों के दावे भी पेश किये जा चुके है. हिंदुस्तान टाइम्स के ५ कर्मचारियों से जबरन इस्तीफे लिए गए थे , उनके मामले भी विचाराधीन हैं. औरंगाबाद के दिव्य मराठी  के कई कर्मचारी दावे कर चुके है. नागपुर में लोकमत श्रमिक संगठन ने कई मामले दाखिल कराये हैं. साथ ही दैनिक bhaskaभास्कर के कुछ कर्मचारी अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं. सुप्रीमकोर्ट के ताजे फैसले के बाद अब इस काम में काफी तेजी आने की उम्मीद है.

अख़बार मालिकों पर संकट बढेगा

साफ है कि पैसे और राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल करके अखबार मालिक अपने कर्मचारियों को उचित वेतन देने से बच रहे हैं. पर ज्यादा दिन ये स्थिति नही रहेगी. देश भर के पत्रकार संगठन अब केन्द्रीय सरकार के स्तर पर इसे उठा रहे हैं. इसके अलावा सरकार से जुड़े संगठनों से भी पत्रकार संगठनो की चर्चा जारी है. केंद्रीय श्रम विभाग की ओर से जल्दी ही देश भर के अख्बार मालिकों को सख्त निर्दश दिए जाने की आशा है.

अखबार मालिकों के झूठे एफिडेविट

पत्रकारों के शोषण में डूबे अखबार मालिकों ने पिछले साल श्रम विभाग को मजीठिया वेतन आयोग पर अमल को लेकर हलफनामे यानी एफिडेविट दिए थे. तमाम अखबारों ने दावे किये थे कि उनके कर्मचारियों को वेतन आयोग के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है. पर ये सब झूठ साबित हो गया है. लोकमत समूह की ओर से राज्य भर में १० कंपनियों की बैलेंस शीट दी गई है. ये सरासर गैरकानूनी है और इस बारे में कारवाई हो सकती है.

भाषाई अख़बारों के पत्रकार आगे

मजीठिया संघर्ष का अनुभव बताता है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में हिंदी और मराठी अखबारों के पत्रकार व अन्य कर्मचारी हौसला बता रहे हैं लेकिन अंग्रेजी अखबारों के पत्रकार चुप्पी साधे हैं. ये चिंता का विषय है.

अहम् मुद्दे

मजीठिया वेतन आयोग के आधार पर भुगतान के लिए क्लेम दायर करने का सिलसिला शुरू हो चुका है . अब अदालतों में मुख्य तौर पर डीए, वेरिएबल पे, अखबारों का टर्नओवर आधारित क्लास, और प्रमोशन सम्बन्धी २० (ऍफ़) के मुद्दे प्रमुख रहेंगे. इसके लिए सभी पत्रकार संगठन एकजुट होकर तयारी करें. बीयूजे से भी सभी कर्मचारी संपर्क कर सकते हैं. हेल्पलाइन -०२२ २२८१६६७१ .

इंद्रकुमार जैन 

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