प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तरप्रदेश की सेवा करनेवाले इच्छुक बीजेपी विधायक प्रत्याशियों के लिए एक नई शर्त रखी है. शर्त के मुताबिक विधायक पद के उम्मीदवारों के लिए सोशल मीडिया पर कम से कम 25 हजार फॉलोअर्स होने चाहिए. हालांकि उनका लक्ष्य हो कि ये आंकड़ा पचास हजार तक पहुंच जाए. इसके साथ ही बीजेपी के राष्ट्रसेवकों को चाहिए कि सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहें.

प्रधानमंत्री की इस पवित्र कामना के पीछे कुछ नहीं तो कम से कम तीन बातें स्पष्ट है. पहली बात तो ये कि वो चाहते हैं कि इस देश का सिटिजन पहले नेटिजन बने. वो सामाजिक स्तर पर नागरिक कर्तव्यों का पालन करे, इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि वो सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहकर इस कामना को फलीभूत करे.

दूसरा कि सोशल मीडिया बेहद गंभीर माध्यम है जिससे कि देश की राजनीतिक दशा और दिशा तय की जा सकेगी और तीसरी बात ये कि मोबाईल को हमेशा डेटा पैक औऱ बैटरी बैक अप से लैश रखना होगा. लेकिन मैं बाकी लोगों की तरह इस सिरे से बहस नहीं करना चाहता कि जिस देश में लोगों के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, उससे डेटा पैक भरवाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है और जो डेटा पैक भरवा सकता है वो उस मध्यवर्ग से आएगा जिसके सवाल अंतिम व्यक्ति के सवाल नहीं होंगे ?

मेरा सवाल दूसरा है.वो ये कि क्या इस देश में लोकतंत्र विनय पाठक का धनवृक्ष है कि एजेंटी दर एजेंटी बढ़ाते जाओ या फिर एम्बे,ओरियफ्लेम की मेंबरशिप चेन योजना है ? ये ठीक बात है कि प्रधानसेवक की ट्विटर पर हैसियत दो नंबर( दूसरे पायदान ) की है औऱ उन्हें पूरा हक है कि वो इसे सिलेब्रेट करें. लेकिन इसे शर्त के तौर पर शामिल करना दरअसल बीजेपी के प्रत्याशियों के लिए कम, आम नागरिकों के लिए ज्यादा फजीहत का काम है.

प्रत्याशियों के लिए तो ये फिर भी बेहद आसान काम है कि वो इसे ठेके पर देकर करवा लेंगे जैसा कि आइटी, पीआर कंपनियों को ठेके पर देकर एसएमएस शूट करवाते आए हैं. लेकिन फॉलोअर्स बनना फिर स्वाभाविक, भावनात्मक स्तर का मामला रह जाएगा या फिर जोर-जबरदस्ती का ? आप बुरा मत मानिएगा, मैंने तो जैसे ही ये खबर पढ़ी, हिन्दी सिनेमा के वो दृश्य याद आने लग गए जिसमे साहूकार जबरदस्ती अंगूठा लगवाकर जमीन अपने नाम करवा लेता है. अभी-अभी जय गंगाजल में भी तो यही दबंगई थी. इसे आप चाहें तो पेड पॉलिटिक्स का माइक्रो वर्जन कह सकते हैं. फॉलोअर्स बनने के शायद पैसे भी दिए जाएं.

यानी जो काम अभी वास्तविक दुनिया में होता आया है( लगभग हर राजनीतिक पार्टी चुनाव के समय कुछ न कुछ प्रलोभन देती रही है). इसका मतलब हुआ कि वास्तविक दुनिया में जो दबंगई, पैसे लूटाने आदि का प्रचलन रहा है, वो अब वर्चुअल स्पेस पर भी शुरू हो जाएगा. कुछ नहीं तो छह महीने की डेटा पैक के साथ बेसिक मोबाईल पकड़ा दिए जाएंगे और ये आंकड़ा छू लिया जाएगा. इसमे पार्टी का वॉररूम भी काम करेगा.

और तो और देखते-देखते इस आंकड़े को इतना महिमामंडित किया जाएगा कि चुनावी नतीजे सेकेंडरी जान पड़ेंगे. चुनाव और इशके परिणाम के पहले ही फॉलोअर्स को लेकर स्टोरी बननी शुरू होगी जो कि जाहिर है स्वाभाविक नहीं होंगे. और आखिरी बात
सोशल मीडिया अपनी पूरी प्रकृति में बिंदास माध्यम है. ये ठीक है इसका इस्तेमाल प्रोपेगेंडा करने से लेकर ट्रॉलिंग आदि के लिए किया जाने लगा है लेकिन मेरी अपनी समझ है कि अभी भी व्यक्तिगत स्तर पर ये माध्यम अपेक्षाकृत ज्यादा खुला है. एक तरफ तो सत्ताधारी दल इसके इस खुलेपन को लगातार कुचलते रहने का काम करता आया है और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने ये शर्त रख दी है. ऐसे में बिना आजाद माहौल के फॉलोअर्स आधारित राजनीति पेड नहीं होगी तो क्या होगी ? और इस राजनीति में ऐसा तो है नहीं कि उनकी सक्रियता नहीं बढ़ेगी जिन्हें स्थानीय मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं होता बल्कि वो राजनीतिक दल और चेहरे को ब्रांड की तरह लेते हैं और उनके लिए सोशल मीडिया प्लेजर जोन का विलास भर है.

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